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पिता_एक आधार जीवन का
#गुप्तरत्न : शायर है जनाब ,लफ़्ज़ों में आग रखते है
#जानवर सा इंसान रखती हूँ
मज़हब कहाँ सिखाता है,आपस में बैर करना ,
दोस्त तुम बने नहीं, न रही कभी रंजिशे आपसी ,
#हर किसी की ज़ुबान पर एक ही सवाल है ,
ज़िंदगी लो सफर पे आ गई ...........
गुप्तरत्न कौन पैर रखते थके,? और कौन दूर तक चल सके ,
#गुप्तरत्न : आधा भरा भी तो है जाम देखो ,
अच्छा लगने लगा है !!
गुप्तरत्न : बारिशों मैं हम भी
shabd
#गुप्तरत्न : आधा भरा भी तो है जाम देखो ,
महसूस की है उन हाथों की सर्दी "गुप्तरत्न" ने,
गुप्तरत्न शब्दों मैं अपने रह जाऊंगा।
यकीं क्या वक्त का,जो है आज ये पल "कल"न हो
हमने भी खुदको अब गज़ब इम्तिहान में रखा है
हिन्दू,मुस्लिम,सिख इसाई सब इसकी शान है,
हलके लफ़्ज़ों से परहेज़ है रत्न
# guptratn माना की पहले सा ,तेरी गलियों में, मेरा आना जाना नहीं,
तुम तुम रहो,खुदको मिटा बैठोगे,मुझ जैसा बन जाने से ll
उसको देखकर क्यूँ नियत मैं खोट आयें
खुद तुझे पुकारेगी मंज़िल ,
Nahi sikhni aesi duniyadari
गुप्तरत्न: मेरा दोष कोई मुझे तुम बता दो
चाहना तो मेरे मन को चाहना,
नहीं मिटेगी मृगतृष्णा कस्तूरी मन के अन्दर है, Mrigtrishna
#पतझड़ गवाह है,की किसी बाग में हमेशा तो बहार न रही
guptratn रहम दिल जानवर और इंसान नहीं देखते , guptratn apna nafa nuksaan nahi dekhte
shayri
mousam kahta hai ban jao mera jaisa
इस दिल-ए-बस्ती में ,मेरे और भी कर्ज़दार बैठे है ॥
dar lgta hai
#dar lagta hai #guptratn डर लगता है,
सुना मैंने तुझे तेरी #आवाज़ में, guptratn
आपके लिए गुप्त रत्न" भावनाओं के समंदर मैं "
"गुप्त रत्न "
" भावनाओं के समंदर मैं "
आता ही नहीं समझना ख़ामोशी को ,
उनको हम समझाएं भी तो क्या ?
उनको एहसास ही नहीं है ,कुछ ,
सीने से यूँ लग जाएँ भी तो क्या ?
अंधे है इस क़दर गुरुर मैं ,वो
हम दिल की तड़प बताएं भी तो क्या ?
कुछ नज़र आता नहीं उनको ,
बेचैनी ये हम दिखलायें भी तो क्या ?
जब यकीं ही नहीं हम पर,तो ,
ये किस्सा आगे बढ़ाएं भी तो क्या ?
जब आँखों को ही न पढ़ सकें ,
तो ज़ुबा से हम सच जताएं भी तो क्या?
सोच जब जिस्म तक हो, वहां
एहसास-ए-दिल समझाएं भी तो क्या ?
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