जिन राहों पे चले थे, मिलकर के हम कभी ,
"गुप्तरत्न " "भावनाओं के समंदर मैं " Guptratn bhaownaon ke samndar mein जिन राहों पे चले थे, मिलकर के हम कभी , वो रास्ते है कह रहे है, आ जाओं फिर अभी , पानी है वही, और वहीं दरिया का किनारा सब कुछ है वैसा ही बस तुम हो यहाँ नहीं


